रविवार, 15 सितंबर 2013

विपरित स्वभाव

विपरित स्वभाव

एक बार तेलानीराम कहीं जा रहे थे।राजस्त में उन्हें एक भिखारी मिला। उसने तेनालीराम को रोककर बोला, ‘‘तेनालीराम जी मैं आपसे एक सलाह लेना चाहता हॅूं।’’
तेनालीराम ने कहां, ‘‘ हां बताओ तुम्हारी क्या समस्या हैं?’’ भिखारी संकोच करता हुआ बोला, ‘‘सुनकर आप नाराज मत होना। दरअसल बचपन से ही मेरी इच्छा थी कि लोग मुझे सेठ जी कहें। लेकिन बदकिस्मती से मैं भिखारी बन गया। सुना हैं कि आपके पास हर समस्या का हल हैं। ऐसा कोई उपाय बताएं कि मेरी इच्छा पूरी हो जाए।’’  तेनालीराम बोले, ‘‘बस, इतनी सी बात। कुछ ही दिनों में लोग तुम्हें सेठजी कहने लगेंगे।’’  भिखारी आश्चर्य से बोला, ‘‘कैसे?’’  तेनालीराम ने कहा, ‘‘सामने वाले चैराहे पर खड़े हो जाओ। अगर तुम्हें वहां कोई सेठजी कहे तो तुम उसे मारने के लिए दौड़ना। बस, उसी समय से तुम्हें सेठजी कहने लगेंगे।’’भखारी ने तेनालीराम का कहा माना।  तेनालीराम ने वहां खेल रहे कुछ बच्चों से कहा, ‘‘सामने जो भिखारी खड़ा है वह सेठ जी कहने पर चिढ़ता हैं। तुम सब उसे चिढ़ाकर मजे करों।’’  बच्चे भिखारी को सेठजी करकर चिढ़ाने लगे। भिखारी उन बच्चों को मारने दौड़ा। बच्चे भाग गए और दूर खड़े होकर चिढ़ाने लगे। लोगों ने देखा तो वे भी उसे सेठजी कहकर मजे करते। उस दिन के बाद से हर कोई उसे सेठजी कहने लगा। अब भिखारी मन ही मन खुश था।  उसकी इच्छा जो पूरी हो गई थी। वह अब जी भर कर तेनालीराम को धन्यवाद देता।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें