शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

डायनामाइट से नोबेल

डायनामाइट से नोबेल

करीब एक सदी पहले एक आदमी अखबार पढ़ रहा था। शोक समाचार के काॅलम पर नजर पड़ते ही वह चैक उठा, क्योंकि शोक समाचार में उसी की मृत्यु की सूचना थी। वह घबरा गया कि आखिर ऐसा कैसे हो गया? गलती समाचार पत्र की थी, जिसने दूसरे व्यक्ति की जगह इसका नाम प्रकाशित कर दिया था।  कुछ पल बाद जब ये आदमी सामान्य हुआ तो 

इसने सोचा कि अगर वाकई में मै मर गया होता तो लोग मुझे कैसे याद करते? यह सोचकर उसने शोक समाचार को पूरा पढा। वह यह पढकर हैरान हो गया कि उसके लिय मौत का व्यापारी और डाइनामाइट किंग जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया था। यह आदमी डायनामाइट का आविष्कार करने वाला अल्फ्रेड नोबेल था। ये सब पढने के बाद अल्फ्रेड ने सोचा कि क्या मेरे मरने के बाद लोग मुझे  ऐसे ही याद करेंग? मन ही मन विचारों में उलझते जा रहे अल्फ्रेड ने तय किया कि वह इस पहचान के साथ नहीं मरना चाहते कि लोग उन्हें मौत का व्यापारी कहकर याद रखेे। इसके बाद से अल्फ्रेड दुनियाभर में शांति प्रयासों मे लग गए। यहीं नहीं उन्होंने अपने नाम से नोबेल पुरस्कार की स्थापना भी की। आज दुनिया उन्हें महान नोबेल पुरस्कार के जनक के तौर पर याद करती है।
आखिर जब हम इस दुनिया से विदा होगे, तो लोग हमें किस रूप में याद रखेगे? यह ऐसा सवाल है जो हम शायद ही कभी सोचते है? इस सवाल का जवाब इस एक छोटी सही कहानी में तलाशा जा सकता है। बस अल्फ्रेड नोबेल की तरह ही हमें भी अपने दिल की आवाज सुननी होगी कि हम जो कर रहे है वह अच्छा या बुरा है? अगर हम भी चाहते है कि लोग हमे एक अच्छे व्यक्ति के रूप मे याद रखें तो हमें अपने जीवन में अच्छे काम ही करने चाहीए तभी लोग हमें भले रूप याद करंेगंे।

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