शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

गति में ही है जीवन


गति में ही है जीवन

एक बार समुद्र की लहरों ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया। आपसी लगाव के चलते वे प्रवाह को अपनी परेशनी समझाने लगी। समुद्र ने काफी समझाने का प्रयास किया कि मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं, गति के साथ जुड़ा हैं, इसलिए गतिशील बनो।

सोमवार, 27 अगस्त 2012

पहला सबक


पहला सबक


एक बार किसी फकीर से किसी सज्जन ने पूछा कि उनका गुरू कौन है?  फकीर ने बताया कि उनका गुरू एक चैर है। अपनी जिंदगी का पहला सबक उन्होने उस चैर से ही सीखा।  इस बात पर वह सज्जन हैरान हुए और पूरी कहानी जाननी चाही।

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

पश्चाताप


पश्चापत

रागिनी रायपुर के तहसील आॅफिस में क्लर्क के पदपर कार्यरत है। घर से रोज लोकल बस द्वारा उसका आॅफिस जाना होता है।  एक दिन जब बस से रागिनी आॅफिस जा रही थी, तो बीच में किसी स्टाॅप पर दो युवक चढ़े। उनमंे से एक ने रंगीन चश्मा पहन रखा था। रागिनी के साथी की, एक खाली सीट खाली थी अतः थोड हटकर रागिनी ने उन्हें बैठने को कहा।  उनमें से चश्माधारी युवक वहीं बैठ गया तथा दूसरा कहीं और जगह देखकर बैठ गया।

सोमवार, 20 अगस्त 2012

मेहनत की कमाई


असली कमाई

मनीष अपने माता-पिता का अकेला बेटा था ।  बुरी संगत क कारण वह कोई कामकाज नहीे करता था ।   एक दिन उसके पिता ने उसकी आदातों से परेशान हो कर साफ-साफ कह दिया कि जब तक तुम कुछ कमा कर नहीं लाओगे, तब तक तुम्हारा खाना-पीना बन्द।  यह कह कर पिता अपने काम पर चले गये।  अब  मनीषा बहुत ही परेशान के कमा कर कहां से लाये?  उसकी पेरशानी को उसकी मां देख नहीं सकी और मां दिल पसीज गया तो वो बोली ‘‘यह लो पांच रूपये और शाम को पापा को बोल देना कमा कर लाया हूॅं ।’’


       शाम को जब पापा ने पुछा के क्या कमा कर लाये?  तो मनीष ने पांच रूपये देते हूए कहा ‘‘ये पांच रूपये कमा कर लाया हूं।’’   पिता ने कहा तो जाओं इसे कुएं में फेक दो।  मनीष ने तुरन्त ऐसा ही किया।  अब रोज यही क्रम हो गया।  एक दिन मां बोली ‘‘आज मेरे पास पैसे नहीं है आज तुम्हें कमा कर ही लाने होंगे।’’  उस दिन मनीष ने एक इमारत के निर्माण में ईंटे ढोने का काम किया और शाम को पांच रूपये कमा कर घर लाया। पिता ने हमेशा की तरह ही कहा जा इन्हे कुऐ में फेक दो ।   तो मनीष बोला, ‘‘सारा दिन कडी महनेत कर के पांच रूपये कमाये हैं। और आप कहते हो के कुऐ में फेक दूं।  तब पिता के मुस्कुराते हुए कहा आज वास्तव में  तुमने मेहनत की है और कमाई की है।  अब तक जत जो पैसे तुमने कुएं में डाले थे, वे मेरी कमाई के थे। अब मनीष को मेहनी की कमाई का महत्व समझ गया।
      
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गुरुवार, 16 अगस्त 2012

बचाया किसने

        एक विद्वान और एक धनवान दो मित्र थे ! दोनों में एक बार बहस छिड़ गई !  धनवान का कहना था कि पैसा हर मुश्किल आसान कर देता है ! जबकि  विद्वान का कहना था के बुद्धि के प्रयोग से हर मुश्किल का हल निकाला जा सकता है ! उकी समय वहाँ से राजा का काफिला गुजरा दोनों ने अपने झगडे में राजा का सम्मान भी नहीं किया राजा ने दोनों को काराग्रह में बंद करवा दिया ! दोनों को इस अपराध में मौत कि सजा सुना दी गयी ! अब दोनों परेशान हो गए ! धनवान के जेल के पहरेदारों को काफी धन का लालच भी दिया मगर कोई लाभ नहीं हुआ !  विद्वान ने अपनी बुद्दी का प्रयोग किया कुछ सोचा और धनवान से कहा जैसा मैं कहूँ वैसा करो  !

,.................... जारी....... पूरी कहानी अगली बार.............

बुधवार, 15 अगस्त 2012

महत्व

        बात १९१७  की है ! साबरमती आश्रम अभी अभी शुरू हुआ था ! गाँधीजी अहमदाबाद के बार्रुम चले जाते !  वहाँ वकीलों और अन्य लोगों से मिलते, आश्रम की चर्चाएँ किया करते ! धीरे- धीरे कुछ वकीलो में गाँधीजी और उनके आश्रम के बार में जानने की जिज्ञासा बढती गयी !
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       आश्रम में बापू खुद ही अपना सारा काम किया करते थे !  एक दिन अनाज कि सफाई चल रही थी !  गाँधीजी, विनोबाजी, और कई लोग अनाज साफ़ कर रहे थे !  कुछ वकील आश्रम में आये !  उनके बैठने के लिए खजूर की चटाई बिछाई गई ! 
        उनमे से  एक  वकील ने बोला,  "हम आपके आश्रम का कुछ न कुछ काम करने के विचार से आये हैं !" 

सोमवार, 13 अगस्त 2012

अमीर कोन

     एक बार एक व्यक्ति रेल में यात्रा कर रहा था ! वह बहुत दुखी लग रहा था ,  उसके  बेटे  का दूसरे शहर में बस दुर्घटना में निधन हो गया था !  वह उसके शव को संस्कार के लियें लेने जा रहा था की किसी ने उसकी जेब साफ़ कर दी थी !  उसके पास रेल से उतरकर वहाँ तक जाने के भी पैसे नहीं थे अब !  रेल में बैठे व्यक्ति उसे दिलासा दे रहे थे !  उसी रेल में एक सेठ भी यात्रा कर रहा था,  उसने अपना पर्स खोला जिसमे हजारों रूपये थे ! उसने अपनी अमीरी दिखाते हुए उस व्यक्ति को बुलाया और पचास रुपये दे दिए और सब लोगो को ऐसे देखने लगा जैसे उसने हजारों रुपये दे दिए ,  और सब लोगो को ऐसे देखने लगा जैसे उसने बहुत बड़ा काम किया हो ! उसी समय एक निर्धन सा दिखने वाला व्यक्ति उस व्यक्ति के पास आया और संवेदना प्रकट करते हुए बोला, "भाई मेरे पास मात्र तीस रुपये है और मुझे रेल से उतर कर अपने गांव जाने के लियें दस रूपये बस के किराये के  लियें चाहिए होंगे ! मैं तुम्हारी अधिक सहायता  नहीं कर पाउँगा, मुझे इसका दुख है ! फिर भी आप ये रुपये रखलो,  मैं अपने गाँव पैदल चला जाऊँगा! यह कह कर उसने आग्रह पूर्वक उसकी जेब में सारे पैसे डाल दिए !  वहाँ बैठे लोग सोच रहे थे कि उन दोनो में से अधिक अमीर कौन था,  सेठ या वो निर्धन व्यक्ति !

किसी जरुरत मंद कि सहायता के लियें यदि कष्ट भी उठाना पडे तो हिचकना नहीं चाहिए !