बुधवार, 15 अगस्त 2012

महत्व

        बात १९१७  की है ! साबरमती आश्रम अभी अभी शुरू हुआ था ! गाँधीजी अहमदाबाद के बार्रुम चले जाते !  वहाँ वकीलों और अन्य लोगों से मिलते, आश्रम की चर्चाएँ किया करते ! धीरे- धीरे कुछ वकीलो में गाँधीजी और उनके आश्रम के बार में जानने की जिज्ञासा बढती गयी !
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       आश्रम में बापू खुद ही अपना सारा काम किया करते थे !  एक दिन अनाज कि सफाई चल रही थी !  गाँधीजी, विनोबाजी, और कई लोग अनाज साफ़ कर रहे थे !  कुछ वकील आश्रम में आये !  उनके बैठने के लिए खजूर की चटाई बिछाई गई ! 
        उनमे से  एक  वकील ने बोला,  "हम आपके आश्रम का कुछ न कुछ काम करने के विचार से आये हैं !" 
        बात १९१७  की है ! साबरमती आश्रम अभी अभी शुरू हुआ था ! गाँधीजी अहमदाबाद के बार्रुम चले जाते !  वहाँ वकीलों और अन्य लोगों से मिलते, आश्रम की चर्चाएँ किया करते ! धीरे- धीरे कुछ वकीलो में गाँधीजी और उनके आश्रम के बार में जानने की जिज्ञासा बढती गयी !
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       आश्रम में बापू खुद ही अपना सारा काम किया करते थे !  एक दिन अनाज कि सफाई चल रही थी !  गाँधीजी, विनोबाजी, और कई लोग अनाज साफ़ कर रहे थे !  कुछ वकील आश्रम में आये !  उनके बैठने के लिए खजूर की चटाई बिछाई गई ! 
        उनमे से  एक  वकील ने बोला,  "हम आपके आश्रम का कुछ न कुछ काम करने के विचार से आये हैं !" 
    गाँधीजी ने कहा, "ठीक है !  यह अनाज साफ़ कीजिए"!  
    एक वकील चौंक कर बोला, "हम यहाँ क्या ज्वार-बाजरा साफ़ करेंगे?"
    गांधीजी बोले,"जी हाँ !  इस समय तो यही काम चल रहा है !" 
मन मारकर वकील अनान साफ करने लगे और फिर दुबारा आश्रम में कोई काम मांगने नहीं आए ! 

असल में गांधीजी की नजारों में आजादी की लड़ाई लड़ना, छुआछूत के लिए उपवास रखना जितना महत्व का काम था, उतने  ही महत्त्व का काम था ज्वार-बाजरा बीनना !  उनका कहना था, सेवा का हर काम पवित्र काम है! कर्म को ठीक से करना ही परमेश्वर की पूजा है, यही मोक्ष है!


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