पहला सबक
पहला सबक
एक बार किसी फकीर से किसी सज्जन ने पूछा कि उनका गुरू कौन है? फकीर ने बताया कि उनका गुरू एक चैर है। अपनी जिंदगी का पहला सबक उन्होने उस चैर से ही सीखा। इस बात पर वह सज्जन हैरान हुए और पूरी कहानी जाननी चाही।
फकीर ने बताया, ‘‘मैं एक गाँव में गया था, जब मैं वहां पहुंचा तो आधी रात हो चुकी थी, सभी के दरवाजे बंद थे। तभी मुझे रास्ते पर एक आदमी मिला, उसने कहा कि सभी दरवाजे तो बंद है अतः आप चाहें तो मेरे साथ मेरे घर में ठहर सकते हैं। लेकिन मैं आपको बता दूं कि मैं एक चोर हूँ।’ मै उसकी सच्चाई से बहुत प्रभावित हुआ क्यौंकि मैं भी इतना सच्चा नहीं था। जितना वह चोर था। मैंने उसके पैर छुए और प्रणाम किया और कहा कि तुम आज से मैंरे गुरू हुए क्योंकि आज मैंने तुमसे सच्चाई सीखी है। मैं चोर के साथ उसके घर गया। चोर ने कहा ‘क्षमा करंे मैं सुबह जल्द लौटूंगा। ऐसा कहकर वह चोरी करने चला गया। सुबह करीब पांच बजे वह लौटा। मैंने पूछा क्या कुछ हाथ लगा? चोर हँसता हुआ बोला आज तो नहीं पर कल फिर कोशिश करेंगे। मैं एक महीने तक चोर के असफल होने पर भी विश्वास बनाए रखने को देखता रहा। मैंने सोचा ‘मैं ईश्वर के न मिलने पर हताश हो जाता हूँ। इस चोर ने मुझे भटकने से बचा लिया।’’ अगर आज ईश्वर नहीं मिला तो क्या, कल अवश्य मिलेगा। इस तरह वह चोर मुझे प्रेरणा दे गया। इस तरह वह मेरा गुरू है।
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