पश्चापत
रागिनी रायपुर के तहसील आॅफिस में क्लर्क के पदपर कार्यरत है। घर से रोज लोकल बस द्वारा उसका आॅफिस जाना होता है। एक दिन जब बस से रागिनी आॅफिस जा रही थी, तो बीच में किसी स्टाॅप पर दो युवक चढ़े। उनमंे से एक ने रंगीन चश्मा पहन रखा था। रागिनी के साथी की, एक खाली सीट खाली थी अतः थोड हटकर रागिनी ने उन्हें बैठने को कहा। उनमें से चश्माधारी युवक वहीं बैठ गया तथा दूसरा कहीं और जगह देखकर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद उस चश्माधारी युवक ने रागिनी को कंधे से छुआ। रागिनी ने गुस्से में उसका हाथ पीछे कर दिया। जब दुबारा भी उसने यही हरकत की तो रागिनी ने गुस्से में कहा, ‘अंधे हो क्या? दिखाई नहीं देता?’
इतने में अगला स्टाॅप आ गया और दूसरा युवक उसका हाथ पकड़कर उठाने के लिए आया और सहारा देकर उसे नीचे उतारा तब रागिनी को ज्ञात हुआ कि वह व्यक्ति वास्तव में ही नेत्रहीन था और रागिनी को अपना साथी समझकर छुकर कुछ कहना चाह रहा था। बहुत पश्चाताप और ग्लानि हुई रागिनी को अपने आप पर।
रागिनी उनसे क्षमा याचना करती इससे पहलीे ही बस चल चुकी थी और वे लोग भी उतरकर दूर चले गए थे। लेकिन उस युवक की मूकता सारे दिन रागिनी की आत्मा पर दस्तक देती रही मानो कह रही हो कि ‘अंधे हम नहीं, आप नेत्र वाले लोग है जो दुख नहीं देखते।’
तब से रागिनी ने नेत्रहीनों के लिए कुछ-न-कुछ करने की प्रतिज्ञा ली और समाज सेवा की ओर प्ररित हुई। रागिनी ने नेत्रदान की भी घोषणा की है शायद यही उसका पश्चातात हो और मूक दस्तकों का उत्तर भी।
नरेन्द्र देवांगन
बहुत सुन्दर वर्णन , भर एक सोच की प्रति छाया भी साथ साथ कह दी रागनी जी ,
जवाब देंहटाएंधन्यवाद